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    क्या एचआईवी पॉजिटिव मां एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है?

    यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय है। चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति के कारण अब यह पूरी तरह संभव है कि एक एचआईवी (HIV) पॉजिटिव मां एक स्वस्थ और एचआईवी-मुक्त बच्चे को जन्म दे सके।   क्या एचआईवी पॉजिटिव मां एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है? पुराने समय में एचआईवी पॉजिटिव होने का मतलब यह माना जाता था कि संक्रमण बच्चे में भी फैलेगा। लेकिन आज, सही इलाज और सावधानी के साथ, संक्रमण फैलने का जोखिम 1% से भी कम रह गया है। संक्रमण को रोकने के मुख्य तरीके (Prevention Steps) 1.  ART (Antiretroviral Therapy): यदि मां गर्भावस्था के दौरान नियमित रूप से ART दवाएं लेती है, तो उसके शरीर में ‘वायरल लोड’ बहुत कम हो जाता है। इससे बच्चे तक वायरस पहुँचने की संभावना लगभग खत्म हो जाती है। 2.  प्रसव के दौरान सावधानी: डॉक्टर स्थिति के अनुसार तय करते हैं कि नॉर्मल डिलीवरी सुरक्षित होगी या सिजेरियन (C-section), ताकि जन्म के समय बच्चा मां के रक्त के संपर्क में न आए। 3.  बच्चे का इलाज: जन्म के तुरंत बाद बच्चे को कुछ हफ्तों तक निवारक (Preventive) दवाएं दी जाती हैं। 4.   स्तनपान (Breastfeeding) संबंधी सलाह: मां के दूध के जरिए संक्रमण फैलने का खतरा होता है, इसलिए डॉक्टर अक्सर सुरक्षित विकल्पों (जैसे फॉर्मूला मिल्क) की सलाह देते हैं। क्या गर्भावस्था के दौरान एचआईवी की दवाएं लेना सुरक्षित है? हाँ, एचआईवी की आधुनिक दवाएं (ART) गर्भवती महिला और भ्रूण दोनों के लिए सुरक्षित मानी जाती हैं। ये दवाएं न केवल मां की सेहत सुधारती हैं, बल्कि बच्चे को संक्रमण से भी बचाती हैं। अगर पिता पॉजिटिव है और मां नेगेटिव, तो क्या बच्चा स्वस्थ होगा? अगर मां नेगेटिव है, तो बच्चा सुरक्षित रहेगा। हालांकि, गर्भधारण की प्रक्रिया के दौरान मां को संक्रमण से बचाने के लिए ‘स्पर्म वॉशिंग’ या PrEP जैसी दवाओं का उपयोग किया जा सकता है। बच्चे की एचआईवी जांच कब की जाती है? जन्म के तुरंत बाद बच्चे का एचआईवी टेस्ट किया जाता है। इसके बाद आमतौर पर 6 हफ्ते, 6 महीने और 18 महीने की उम्र में दोबारा टेस्ट किए जाते हैं ताकि पूरी तरह पुष्टि हो सके कि बच्चा स्वस्थ है।…

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    एड्स महामारी का इतिहास

    एड्स (AIDS) का इतिहास केवल एक बीमारी की कहानी नहीं है, बल्कि यह विज्ञान, संघर्ष और मानवीय जज्बे की एक लंबी यात्रा है। 1980 के दशक में शुरू हुई यह महामारी आज एक प्रबंधनीय स्थिति (manageable condition) तक पहुँच चुकी है। एड्स महामारी का इतिहास: सन्नाटे से समाधान तक का सफर HIV/AIDS ने पिछले चार दशकों में दुनिया को जिस तरह से बदला है, वैसा किसी और आधुनिक बीमारी ने नहीं किया। आइए जानते हैं इस महामारी के कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव: रहस्यमयी शुरुआत (1981-1983) इस महामारी की आधिकारिक शुरुआत 5 जून, 1981 को मानी जाती है, जब अमेरिका के CDC (Centers for Disease Control) ने फेफड़ों के एक दुर्लभ संक्रमण के कुछ मामलों की रिपोर्ट दी। शुरुआत में इसे केवल एक विशिष्ट समूह की बीमारी माना गया, लेकिन जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि यह वायरस किसी को भी प्रभावित कर सकता है। वायरस की पहचान (1983-1984) 1983 में, पेरिस के पाश्चर इंस्टीट्यूट के डॉ. ल्यूक मॉन्टेनियरे और उनकी टीम ने उस वायरस की खोज की जो एड्स का कारण था। बाद में इसे HIV (Human Immunodeficiency Virus) नाम दिया गया। डर और कलंक का दौर (1980 का दशक) शुरुआती वर्षों में, इस बीमारी को लेकर समाज में भारी डर और भ्रम था। लोग मरीजों से हाथ मिलाने या पास बैठने में भी डरते थे। इसी दौरान रयान व्हाइट जैसे युवाओं और एलिजाबेथ टेलर जैसी हस्तियों ने इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई। विज्ञान की जीत: ART का उदय (1990 का दशक)…

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